शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

अधूरे छूटे पन्नें

मैं नहीं जानता की मैं ये क्यों लिख रहा हूँ। बस, अब ये "अधूरे छूटे पन्नें" यूँ देखे नहीं जाते और इनसे ही अपना अकेलापन बाँट लेता हूँ।

जिंदगी के अब तक के सफर में बहुत सारे उतार चढ़ाव आये। कभी हँसा कभी रोया, कभी कुछ पाया तो कभी खोया, कभी सबका साथ था तो कभी विरान तन्हाई। एक ये पन्ने ही थे जो हर वक्त मेरे साथ थे। हमेशा, एक हमसाये की तरह। मेरे साथ होने वाली हर छोटी से छोटी बात पर हम दोनों गुफ्तगू करते और फिर वो बात, वो लम्हे और वो गुफ्तगू ये अपने आप में संजो लेते।

अपनी दुनिया में इनके साथ मजे से समय बीत रहा था। पर अचानक समय ने रुख बदला और इनसे थोड़ी अनबन हो गई, जायज भी था क्योकि मेरी जिंदगी में इनकी जगह कोई और लेने लगा था। काफ़ी दिनों तक रूठे रहे मुझसे, आखिर मनाना पड़ा। सुलह जरूरी भी थी क्योंकि इनके बगैर 'मैं', 'मैं' नही था और मेरे बगैर इनका कोई वजूद न था। अब इस नये स्वरुप में एक बार फिर चल पड़ा हूँ  मेरे इस हमसाये के साथ, मेरे जीवन का हर एक रंग इनमे संजोने को।

ये पन्नें मात्र पन्नें नही है, इनमे एक जिंदगी निहित है। अपने आप में अधूरे होकर भी बहुत कुछ संजोये हुए है ये 'कुछ अधूरे छूटे पन्नें'।

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© daxat rawal